राजीव दीक्षित जी द्वारा बताए गए कुछ ऐसे आयुर्वेदिक नियम जो आपकी जीवनशैली को पूरी तरह बदल सकते हैं।

1. भोजन और पानी से जुड़े जरूरी नियम

हमारे शरीर में भोजन का पाचन पेट के एक हिस्से में होता है जिसे आमाशय (जठर) कहते हैं। जैसे ही हम खाना खाते हैं, वहाँ जठराग्नि (पाचन की आग) प्रदीप्त होती है।

  • खाने के तुरंत बाद पानी न पीएं: भोजन के तुरंत बाद पानी पीने से जठराग्नि शांत हो जाती है और खाना पचने की बजाय सड़ने लगता है। खाना खाने के कम से कम 1.5 घंटे (डेढ़ घंटे) बाद ही पानी पीएं।
  • घूंट-घूंट करके पानी पीएं: पानी को हमेशा मुंह में घुमा-घुमाकर, घूंट-घूंट (sip) करके पीना चाहिए। इससे मुंह की लार पेट में जाती है जो पेट के एसिड को शांत करती है।
  • ठंडा पानी बिल्कुल न पीएं: फ्रिज या बर्फ का ठंडा पानी पीने से पेट सिकुड़ता है और शरीर की ऊर्जा उसे गर्म करने में नष्ट होती है। हमेशा गुनगुना पानी पीएं। गर्मियों में आप मिट्टी के घड़े का पानी पी सकते हैं।
  • बैठकर पानी पीएं: कभी भी खड़े होकर पानी न पीएं, इससे घुटनों के दर्द की समस्या हो सकती है।
  • सुबह उठते ही पानी पीएं (उषापान): सुबह उठते ही बिना मुंह धोए सबसे पहले 2 से 3 गिलास गुनगुना पानी घूंट-घूंट करके पीएं। सुबह की लार शरीर के लिए अमृत समान होती है।

2. बर्तनों का विज्ञान: लोटा बनाम ग्लास

आयुर्वेद के अनुसार, पानी में यह गुण होता है कि वह जिस पात्र में रखा जाता है, उसके गुण अपना लेता है।

पृष्ठ तनाव (Surface Tension) का नियम: गोल बर्तनों का पृष्ठ तनाव कम होता है। कम पृष्ठ तनाव वाला पानी शरीर की आंतों की सफाई बहुत अच्छे से करता है।

  • लोटे का पानी सबसे बेहतर: लोटा गोल होता है, इसलिए इसमें रखे पानी का पृष्ठ तनाव कम होता है जो पेट को साफ रखता है।
  • ग्लास से बचें: ग्लास विदेशी (पुर्तगाली) संस्कृति की देन है। यह रेखीय (linear) होता है, जिससे इसका पृष्ठ तनाव ज्यादा होता है और यह आंतों को सिकोड़ सकता है, जो कब्ज का कारण बनता है।

3. भोजन की आदतें और ऋतुचर्या

  • खड़े होकर न खाएं: हमेशा जमीन पर सुखासन में बैठकर भोजन करें।
  • विरुद्ध आहार से बचें: ऐसी चीजें साथ में न खाएं जिनकी प्रकृति एक-दूसरे के विपरीत हो।
    • दूध और दही साथ में न लें।
    • शहद और घी बराबर मात्रा में कभी साथ न खाएं।
    • कटहल खाने के बाद दूध न पीएं।
    • खट्टे फलों के साथ दूध बिल्कुल न लें (केवल आंवला एक अपवाद है, जिसे दूध के साथ लिया जा सकता है)।
  • भोजन का समय: सुबह का भरपूर भोजन 9:30 से 10:00 बजे तक कर लें क्योंकि इस समय जठराग्नि सबसे तीव्र होती है। शाम का भोजन सूरज डूबने से पहले यानी 5:00 से 6:00 बजे के बीच कर लें।

4. आम बीमारियों के सरल आयुर्वेदिक उपचार

विभिन्न शारीरिक समस्याओं के लिए कुछ बेहद कारगर घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय नीचे दिए गए हैं:

समस्याअचूक आयुर्वेदिक उपाय
डार्क सर्कल्स और चर्म रोगसुबह की पहली लार (थूक) को आंखों के नीचे या दाद-खाज, खुजली पर लगाकर हल्की मालिश करें।
अनिद्रा और खर्राटेरात को सोते समय गाय का हल्का गुनगुना घी एक-एक बूंद दोनों नाक में डालें। इससे याददाश्त भी बढ़ती है।
हाई ब्लड प्रेशर (High BP)शरीर में एसिडिटी बढ़ने से बीपी बढ़ता है। इसके लिए क्षारीय चीजें खाएं जैसे- मेथी दाना (रात को भिगोकर सुबह चबाएं), लौकी का रस, पालक और बैंगन
अस्थमा (दमा)दालचीनी को शहद या गुड़ के साथ लें। इसके अलावा रोज 50 ग्राम कच्चा नारियल चबा-चबाकर खाएं।
गंभीर घुटनों का दर्द (Arthritis)जोड़ों के दर्द के लिए चूना (गेंहू के दाने के बराबर) दही, छाछ या पानी में मिलाकर रोज खाएं। हारसिंगार (पारिजात) के 4-5 पत्तों को पीसकर पानी में उबालें, आधा होने पर छानकर सुबह खाली पेट पीएं।
थायराइड (Thyroid)हरे धनिए के पत्ते की चटनी (बिना नमक-मसाले के) एक चम्मच, एक गिलास गुनगुने पानी में मिलाकर पीएं।
मुंह के छालेयह पेट साफ न होने का लक्षण है। तुरंत आराम के लिए होम्योपैथी दवा Borex 30 या 200 की तीन खुराकें पानी में मिलाकर लें।
पथरी (Stone)पथरी के रोगी चूना कभी न खाएं। इसके लिए पाषाणभेद पौधे का काढ़ा पीएं या होम्योपैथिक दवा Berberis Vulgaris (Mother Tincture) की 10-10 बूंदें चौथाई कप पानी में दिन में 3-4 बार लें।

5. कुछ और महत्वपूर्ण बातें

  • सेंधा नमक का प्रयोग करें: समुद्री आयोडीन युक्त नमक की जगह हमेशा सेंधा नमक (पत्थर वाला नमक) या काला नमक खाएं। इससे बीपी और जोड़ों के दर्द में चमत्कारी लाभ होता है।
  • मैगी और नूडल्स से दूर रहें: नूडल्स सड़े हुए मैदे से बनते हैं और इन्हें बनाने में हानिकारक तत्वों का प्रयोग होता है, जो आंतों को बर्बाद कर देते हैं।
  • फ्रिज के नियमों का पालन करें: फ्रिज में रखी चीज को बाहर निकालकर कम से कम 48 मिनट के लिए रख दें, जब वह सामान्य तापमान पर आ जाए, तभी उसका सेवन करें। फ्रिज की चीजों को बार-बार गर्म करने की गलती न करें।
  • नियमितता का नियम: आयुर्वेद की किसी भी दवा या औषधि का लगातार प्रयोग अधिकतम 3 महीने तक ही करें। इसके बाद 15-20 दिन का ब्रेक दें और फिर दोबारा शुरू कर सकते हैं।

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