जब यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में बुनियादी शिक्षा के लिए स्कूल-कॉलेज तक नहीं थे, तब भारत में एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय चल रहा था जहां दुनिया भर से लोग सिर्फ ज्ञान की तलाश में खींचे चले आते थे। यह कोई साधारण शिक्षण संस्थान नहीं था, बल्कि दुनिया का पहला पूरी तरह से आवासीय (रेजिडेंशियल) विश्वविद्यालय था, जहां रहना, खाना, इलाज और विश्वस्तरीय पढ़ाई पूरी तरह निशुल्क थी।
चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत और इंडोनेशिया जैसे देशों के विद्यार्थी यहां महीनों का दुर्गम सफर तय करके पहुंचते थे। लेकिन इस ज्ञान के केंद्र का अंत इतना दर्दनाक था कि इसकी लाइब्रेरी की 90 लाख दुर्लभ किताबें महीनों तक जलती रहीं।
1. नालंदा की जमीन: विश्वविद्यालय बनने से पहले का गौरवशाली इतिहास
अक्सर लोगों को लगता है कि 5वीं शताब्दी में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने अचानक एक खाली मैदान देखा और वहां यह विशाल यूनिवर्सिटी खड़ी कर दी। ऐतिहासिक सच्चाई इससे कहीं ज्यादा समृद्ध और दिलचस्प है। नालंदा की मिट्टी यूनिवर्सिटी की पहली ईंट रखे जाने से करीब एक हजार साल पहले से ही ज्ञान, ध्यान और विचार-विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र थी।
राजगृह का सानिध्य और आध्यात्मिक ऊर्जा
वैदिक और प्राचीन बौद्ध-जैन ग्रंथों में इस जगह को ‘नालंद’ या ‘नालमदा’ नाम से जाना गया है। यह क्षेत्र मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी राजगृह (वर्तमान राजगीर) से महज कुछ किलोमीटर दूर था। राजगृह जहां राजनीति और सैन्य शक्ति का केंद्र था, वहीं नालंदा साधु-संतों, तपस्वियों और दार्शनिकों का बौद्धिक ठिकाना बना हुआ था।
भगवान महावीर और भगवान बुद्ध का जुड़ाव
इस भूमि की महत्ता जैन और बौद्ध दोनों परंपराओं के शिखर पुरुषों से जुड़ी हुई है:
- भगवान महावीर स्वामी: जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने अपने जीवन के तीन दशकों से भी अधिक चातुर्मास (वर्षा ऋतु का प्रवास) इसी नालंदा-राजगीर क्षेत्र में बिताए। नालंदा के ‘बाहरिक’ उपनगर में वे ठहरते थे और यहीं उनकी मुलाकात आजीवक संप्रदाय के प्रवर्तक मक्खलि गोशाल से हुई थी।
- भगवान बुद्ध और पावरिक आम्रवण: भगवान बुद्ध जब भी मगध की यात्रा पर निकलते, नालंदा जरूर रुकते थे। यहां का प्रसिद्ध आम का बगीचा ‘पावरिक आम्रवण’ एक धनी व्यापारी ने तथागत और उनके भिक्षु संघ को दान कर दिया था। बुद्ध इसी शांत आम्रकुंज में बैठकर धर्म और दर्शन के गहरे उपदेश दिया करते थे।
ज्ञान के प्रतीक सारिपुत्र की जन्मभूमि
बुद्ध के दो सबसे प्रमुख और परम ज्ञानी शिष्य थे—सारिपुत्र और महामौद्गल्यायन। इनमें से सारिपुत्र का जन्म नालंदा की इसी पवित्र पावन धरती पर हुआ था। बौद्ध दर्शन में सारिपुत्र को प्रज्ञा और तर्कशास्त्र का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। उन्होंने इसी भूमि पर साधना की और यहीं महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। यही वजह थी कि सदियों तक देश-विदेश के बौद्ध भिक्षुओं के लिए नालंदा एक ऐसा तीर्थ बना रहा, जहां कदम रखते ही उन्हें अपने महान गुरुओं की मौजूदगी का अहसास होता था।
2. सम्राट अशोक की पहली नींव और गुप्त काल का स्वर्णिम विस्तार
भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के करीब तीन सौ साल बाद, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य सम्राट अशोक नालंदा आए। अशोक ने सारिपुत्र के निर्वाण स्थल पर एक भव्य और विशाल चैत्य स्तूप का निर्माण करवाया। साथ ही भिक्षुओं के ठहरने और अध्ययन के लिए एक व्यवस्थित बौद्ध विहार बनवाया। कई आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि सम्राट अशोक का यही विहार आगे चलकर नालंदा महाविहार के संस्थागत ढांचे की पहली वास्तविक नींव बना।
3. गुप्त साम्राज्य का स्वर्ण युग: कुमारगुप्त से बालादित्य तक का सफर
पांचवीं शताब्दी आते-आते नालंदा में देशी-विदेशी विद्वानों और छात्रों की भीड़ इतनी बढ़ चुकी थी कि खुले पेड़ों के नीचे की गोष्ठियां छोटी पड़ने लगीं। उस समय उत्तर भारत पर गुप्त वंश का शासन था, जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग (Golden Age) कहा जाता है।
| गुप्त सम्राट | नालंदा के विकास में प्रमुख योगदान |
| कुमारगुप्त प्रथम (427 ई.) | नालंदा विश्वविद्यालय की औपचारिक स्थापना की और पहला भव्य बौद्ध विहार बनवाया। |
| बुद्धगुप्त | दक्षिण दिशा में विशाल बहुमंजिला विहार का निर्माण करवाया ताकि बढ़ते छात्रों को जगह मिले। |
| तथागतगुप्त | परिसर में कलात्मक नक्काशीदार खंभों वाला नया मठ बनवाया और दैनिक खर्चों के लिए फंड दिया। |
| नरसिंहगुप्त बालादित्य | भगवान बुद्ध को समर्पित लगभग 300 फीट ऊंचा गगनचुंबी मंदिर बनवाया और 100 गांवों का राजस्व दान किया। |
| वज्र | विश्वविद्यालय के पश्चिमी हिस्से में एक और विशाल आवासीय परिसर का निर्माण कराया। |
सम्राट कुमारगुप्त स्वयं सनातन धर्म के अनुयायी और भगवान कार्तिकेय के परम उपासक थे। इसके बावजूद उन्होंने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महाविहार के निर्माण में अपना पूरा राजकीय खजाना खोल दिया।
नरसिंहगुप्त बालादित्य द्वारा 100 समृद्ध गांवों का कर (Tax) नालंदा को सौंपने का फैसला ऐतिहासिक था। इन गांवों के किसान और व्यापारी जो भी लगान या अनाज सरकार को देते थे, वह सीधे नालंदा के भंडारों में पहुंचता था। इससे विश्वविद्यालय पूरी तरह आत्मनिर्भर बन गया और उसे प्रशासनिक खर्चों के लिए कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ी।
4. सम्राट हर्षवर्धन का दौर: सुरक्षा प्राचीर और अंतरराष्ट्रीय पहचान
सातवीं शताब्दी में जब गुप्त साम्राज्य कमजोर पड़ा, तब कन्नौज के प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन ने नालंदा को अपना मुख्य संरक्षण दिया। हर्षवर्धन ने देखा कि ज्ञान का यह वैश्विक केंद्र खुला और असुरक्षित है।
- मजबूत पीली ईंटों का परकोटा: हर्षवर्धन ने पूरे विश्वविद्यालय परिसर के चारों तरफ ऊंची और चौड़ी पीली ईंटों की अभेद्य दीवार बनवाई, जिसे भेदना किसी भी बाहरी सेना के लिए नामुमकिन था।
- सिंह द्वार की व्यवस्था: परिसर में आने-जाने के लिए केवल एक मुख्य द्वार रखा गया, जिसे ‘सिंह द्वार’ कहा गया। यहां 24 घंटे कड़ा पहरा रहता था।
- 200 गांवों का ऐतिहासिक दान: विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हर्षवर्धन ने दान किए गए गांवों की संख्या 100 से बढ़ाकर सीधे 200 कर दी। अब 200 गांवों से आने वाला शुद्ध घी, दूध, चावल, अनाज और कपड़े नालंदा की विशाल रसोइयों में नियमित रूप से पहुंचते थे।
5. चीनी यात्री ह्वेनसांग की आंखों देखा हाल: एडमिशन टेस्ट और सख्त अनुशासन
साल 630 ईसवी के आसपास चीनी विद्वान और भिक्षु ह्वेनसांग (Xuanzang) गोबी के तपते रेगिस्तान, बर्फीले पहाड़ों और डाकुओं से भरे रास्तों को पार करते हुए नालंदा पहुंचे। उन्होंने अपनी मशहूर यात्रा डायरी ‘सी-यू-की’ (पश्चिमी दुनिया का रिकॉर्ड) में नालंदा की व्यवस्था का जो सजीव खाका खींचा है, वही आज हमारे पास इस विश्वविद्यालय का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है।
दुनिया की सबसे कठिन प्रवेश परीक्षा: ‘द्वार पंडित’
ह्वेनसांग लिखते हैं कि नालंदा में दाखिला पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था, चाहे वह किसी देश का राजकुमार ही क्यों न हो।
विश्वविद्यालय के सिंह द्वार पर महापंडित बैठते थे, जिन्हें ‘द्वार पंडित’ कहा जाता था। बाहर से आने वाले हर छात्र को अंदर कदम रखने से पहले द्वार पंडित के सामने बैठकर बेहद कठिन मौखिक परीक्षा (Oral Test) और शास्त्रार्थ से गुजरना पड़ता था। द्वार पंडित दर्शन, व्याकरण, तर्कशास्त्र और ब्रह्मांड विज्ञान के ऐसे पेचीदा सवाल पूछते थे कि बड़े-बड़े विद्वानों के पसीने छूट जाते थे।
ह्वेनसांग के अनुसार, द्वार पंडित के सवालों के आगे 10 में से 8 या 9 विद्यार्थी फेल हो जाते थे और उन्हें बाहर से ही वापस लौटना पड़ता था। केवल 10 से 20 प्रतिशत सबसे कुशाग्र और मेधावी छात्रों को ही नालंदा के अंदर कदम रखने की अनुमति मिलती थी।
10,000 छात्र और 2,000 आचार्य: 5:1 का अनोखा अनुपात
ह्वेनसांग के दस्तावेजों के अनुसार, उस समय नालंदा में एक साथ करीब 10,000 छात्र रह रहे थे। इन छात्रों को पढ़ाने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए परिसर में 2,000 से अधिक विद्वान आचार्य चौबीसों घंटे मौजूद रहते थे। यानी हर पांच छात्रों पर एक शिक्षक का व्यक्तिगत ध्यान था।
पढ़ाई का दायरा: केवल धर्म नहीं, संपूर्ण विज्ञान
नालंदा सिर्फ बौद्ध दर्शन तक सीमित नहीं था। यहां ज्ञान की हर उस शाखा का मंथन होता था जो मानव जीवन को बेहतर बना सके:
- वैदिक और सनातन साहित्य: चारों वेद, उपनिषद और सांख्य दर्शन।
- चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद): औषधियां, जड़ी-बूटियों की पहचान, रसायन शास्त्र और नाड़ी विज्ञान।
- गणित और खगोल शास्त्र: शून्य, दशमलव, ग्रहों की चाल और सटीक पंचांग गणना।
- भाषा और तर्कशास्त्र: पाणिनी का संस्कृत व्याकरण और हेतुविद्या (Logic)।
ह्वेनसांग स्वयं कई वर्षों तक नालंदा में रहे। उन्होंने तत्कालीन कुलपति आचार्य शीलभद्र के चरणों में बैठकर योगशास्त्र और संस्कृत सीखी। बाद में उनके ज्ञान को देखते हुए उन्हें नालंदा में पढ़ाने का दायित्व भी सौंपा गया।
इत्सिंग का विवरण और आधुनिक जल-घड़ी (Clepsydra)
ह्वेनसांग के कुछ दशकों बाद साल 673 ईसवी में एक और चीनी यात्री इत्सिंग (Yijing) नालंदा पहुंचे। इत्सिंग ने नालंदा के समय प्रबंधन की बहुत तारीफ की। उन्होंने लिखा कि परिसर में समय नापने के लिए आधुनिक तांबे के बर्तनों वाली पानी की घड़ियों का इस्तेमाल होता था। जैसे ही एक प्रहर पूरा होता, बड़े-बड़े नगाड़े और घंटियां बजाकर पूरे परिसर में समय की सूचना दी जाती थी। इत्सिंग जब लौटे, तो अपने साथ करीब 400 दुर्लभ संस्कृत ग्रंथों की प्रतियां लेकर चीन गए थे।
6. पाल वंश का संरक्षण और नालंदा की 9 मंजिला लाइब्रेरी ‘धर्मगंज’
आठवीं शताब्दी में बंगाल और बिहार में पाल साम्राज्य का उदय हुआ। पाल राजाओं के दौर में नालंदा के पुस्तकालय का जो विस्तार हुआ, वह इतिहास में अद्वितीय है।
ज्ञान का पहाड़: ‘धर्मगंज’
नालंदा की विश्वप्रसिद्ध लाइब्रेरी का नाम ‘धर्मगंज’ था, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘ज्ञान का पर्वत’ या ‘सत्य का खजाना’। यह कोई सामान्य कमरा या शेल्फ नहीं थी, बल्कि तीन गगनचुंबी बहुमंजिला इमारतों में फैली एक विशाल ज्ञान नगरी थी:
- रत्नासागर: दुर्लभ पांडुलिपियों और आध्यात्मिक ग्रंथों का अथाह सागर।
- रत्नदधि: नौ मंजिला ऊंची एक भव्य इमारत, जिसमें खगोल विज्ञान, गणित, तंत्र और चिकित्सा के सबसे रहस्यमयी ग्रंथ सुरक्षित थे।
- रत्नरंजक: कला, व्याकरण, साहित्य और शिल्प पर आधारित ग्रंथों का खूबसूरत संग्रह।
इस नौ मंजिला लाइब्रेरी में ताड़ के पत्तों और विशेष भोजपत्रों पर हाथ से लिखी गई करीब 90 लाख से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां सहेज कर रखी गई थीं।
इंडोनेशिया के राजा का अंतरराष्ट्रीय मठ
पाल सम्राट देवपाल के समय सुमात्रा और जावा (वर्तमान इंडोनेशिया) के शैलेंद्र वंशी राजा बालपुत्रदेव ने नालंदा के महत्व को समझा। उन्होंने सम्राट देवपाल के पास अपना राजदूत भेजकर इंडोनेशिया के विद्यार्थियों के लिए नालंदा में एक अलग बौद्ध मठ बनवाने की अनुमति मांगी। देवपाल ने न सिर्फ इसकी मंजूरी दी, बल्कि उस विदेशी मठ की व्यवस्था के लिए पांच गांवों का लगान भी हमेशा के लिए दान कर दिया। यह इस बात का अकाट्य सबूत है कि नालंदा उस दौर का सच्चा ग्लोबल नॉलेज हब था।
7. खिलजी का खूनी हमला और ज्ञान का सबसे बड़ा विनाश
12वीं शताब्दी के अंत (1193 ईसवी) में भारत का यह गौरवशाली अध्याय एक भयानक त्रासदी की भेंट चढ़ गया। मोहम्मद गोरी का एक क्रूर और महत्वाकांक्षी सिपहसालार इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी बिहार के इलाकों को लूटता हुआ आगे बढ़ रहा था।
कुरान के पन्नों पर दवा और खिलजी की ईर्ष्या
इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज की किताब ‘तबाकात-ए-नासिरी’ और अन्य स्रोतों में एक बेहद चर्चित घटना का जिक्र मिलता है। नालंदा पर हमला करने से कुछ समय पहले खिलजी एक लाइलाज और गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया। उसके अपने हकीम और शाही डॉक्टर हार मान चुके थे।
अंत में किसी दरबारी की सलाह पर नालंदा के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलाया गया। कट्टर खिलजी ने शर्त रखी कि वह किसी काफिर (गैर-मुस्लिम) की दी हुई कोई दवा या काढ़ा नहीं पिएगा, फिर भी वैद्य को उसे ठीक करना होगा।
आचार्य राहुल श्रीभद्र ने धैर्य से काम लिया। उन्होंने खिलजी को पवित्र कुरान की एक प्रति दी और कहा कि वह रोजाना इसके तय पन्ने पढ़ा करे। खिलजी ने ऐसा ही किया और एक ही हफ्ते में बिल्कुल स्वस्थ हो गया।
दरअसल, आचार्य ने कुरान के पन्नों के कोनों पर एक अदृश्य, बेस्वाद और अत्यंत प्रभावशाली आयुर्वेदिक दवा का लेप लगा दिया था। जब खिलजी थूक लगाकर पन्ने पलटता, तो वह दवा धीरे-धीरे उसके पेट में जाती रही और उसने बीमारी को जड़ से खत्म कर दिया।
अपनी जान बचाने वाले आचार्य के प्रति सम्मान जताने के बजाय, खिलजी के अंदर एक भयानक हीन भावना, जलन और नफरत भर गई। उसे यह बात बर्दाश्त नहीं हुई कि जो काम उसके तुर्क हकीम नहीं कर सके, वह एक भारतीय बौद्ध भिक्षु ने अपनी बुद्धि से कर दिखाया। इसी ईर्ष्या और अहंकार में उसने तय किया कि वह इस पूरे ज्ञान केंद्र को ही दुनिया के नक्शे से मिटा देगा।
वह काली रात और 3 महीने तक जलती किताबें
1193 ईसवी की एक रात खिलजी की हथियारबंद सेना ने नालंदा की दीवारों को तोड़कर अंदर धावा बोल दिया। परिसर में कोई सेना नहीं थी, सिर्फ निहत्थे और ध्यानमग्न भिक्षु थे:
- हजारों निहत्थे बौद्ध भिक्षुओं और वयोवृद्ध आचार्यों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया।
- कई विद्वानों को परिसर की छतों से नीचे फेंक दिया गया और कई को जिंदा दीवारों में चुनवा दिया गया।
- सैनिकों ने मशालें लेकर ‘धर्मगंज’ की तीनों विशाल इमारतों—रत्नासागर, रत्नदधि और रत्नरंजक में आग लगा दी।
आग इतनी विकराल थी और किताबों का जखीरा इतना बड़ा था कि नालंदा की वह विशाल लाइब्रेरी लगातार तीन महीने तक धू-धू कर जलती रही। हवा में सदियों पुराने विज्ञान, गणित, रसायन और दर्शन के जलते हुए पन्ने महीनों तक उड़ते रहे और बिहार का आसमान धुएं से काला पड़ा रहा।
उस रात सिर्फ कागज नहीं जले थे, बल्कि नागार्जुन के रसायन विज्ञान के गुप्त फार्मूले, आर्यभट्ट के खगोलशास्त्र के सूत्र और भारत का हजारों साल का संचित बौद्धिक वैभव हमेशा के लिए राख के ढेर में बदल गया।
8. गुमनामी से पुनर्जन्म: कनिंघम की ऐतिहासिक खोज और यूनेस्को की मुहर
हमले के बाद अगले 700 सालों तक नालंदा इतिहास के अंधेरे में खोया रहा। बची-खुची इमारतों पर धूल, मिट्टी और मलबे की परतें जमती गईं और यह पूरी जगह एक सुनसान बीहड़ टीला बनकर रह गई।
ह्वेनसांग की डायरी और अलेक्जेंडर कनिंघम का जुनून
1840 के दशक में एक फ्रांसीसी विद्वान स्तानिस्लास जूलियन ने ह्वेनसांग की पुरानी चीनी डायरी ‘सी-यू-की’ का फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया। जब ब्रिटिश सेना के इंजीनियर और पुरातत्वविद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस अनुवाद को पढ़ा, तो उनके होश उड़ गए।
ह्वेनसांग ने सातवीं सदी के भारत की भौगोलिक दूरियों का इतना सटीक ब्योरा दिया था कि कनिंघम समझ गए कि यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। 1861 में लॉर्ड कैनिंग की मदद से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना हुई और कनिंघम इसके पहले डायरेक्टर जनरल बने।
कनिंघम ह्वेनसांग के बताए नक्शों और कदमों को नापते हुए बिहार के एक अनजान गांव ‘बड़गांव’ पहुंचे। जब वहां के विशाल मिट्टी के टीलों की खुदाई शुरू कराई गई, तो कुछ ही फीट नीचे से लाल ईंटों की वही भव्य दीवारें, बौद्ध भिक्षुओं के अध्ययन कक्ष और जली हुई पांडुलिपियों के काले अवशेष मिलने लगे। कनिंघम ने पूरी दुनिया के सामने साबित कर दिया कि यही वह महान नालंदा विश्वविद्यालय है जिसे दुनिया भूल चुकी थी।
खुदाई में मिले प्रमुख वैज्ञानिक और पुरातात्विक साक्ष्य
एएसआई द्वारा की गई खुदाई में कुल 13,463 प्राचीन दुर्लभ अवशेष बरामद किए गए हैं:
- 11 विशाल बौद्ध मठ और 6 भव्य मंदिर: अत्यंत सुव्यवस्थित ड्रेनेज सिस्टम और वेंटिलेशन वाले कमरे।
- प्राचीन सिलबट्टे और खरल (Mortar and Pestle): जिनका उपयोग आचार्य और छात्र जड़ी-बूटियों को पीसकर भस्म और औषधियां बनाने के लिए करते थे।
- दवाइयों के बड़े मर्तबान: रसोइयों और चिकित्सा कक्षों से मिले मिट्टी के बड़े जार, जिनमें औषधीय अर्क और तेल रखे जाते थे।
- कांस्य और धातु के उपकरण: रसायन और भस्म बनाने के लिए प्रयुक्त होने वाले विशेष चम्मच और धातु पात्र।
- काले धुएं की मोटी परतें: कमरों और दीवारों पर आज भी 12वीं सदी में लगी आग और जलती किताबों के धुएं की कालिख साफ दिखाई देती है।
- आधिकारिक राजमुद्रा: मिट्टी की सील जिस पर स्पष्ट अक्षरों में लिखा है—“श्री नालंदा महाविहार्य आर्य भिक्षु संघस्य”।
- मनोरंजन के साधन: छात्रों के खाली समय के लिए टेराकोटा के पासे, कौड़ियां और कांस्य के शीशे।
इतिहासकारों का अनुमान है कि 57 एकड़ में फैले इस ऐतिहासिक परिसर के केवल 10% हिस्से की ही अब तक खुदाई हो पाई है, जबकि 90% हिस्सा आज भी जमीन के नीचे अपने भीतर न जाने कितने राज दफन किए हुए है।
प्राचीन भारत के इस अद्वितीय बौद्धिक और स्थापत्य महत्व को देखते हुए साल 2016 में यूनेस्को (UNESCO) ने नालंदा महाविहार को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया। नालंदा आज भी हमें यह याद दिलाता है कि ईंट-पत्थरों की इमारतें भले ही जलाई जा सकती हैं, लेकिन भारत की ज्ञान और सत्य की खोज की भावना कभी नष्ट नहीं हो सकती।