महाराष्ट्र के पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के तट पर कमर पर हाथ रखे, एक साधारण ईंट पर खड़े भगवान विट्ठल की छवि जिसने भी देखी है, उसके मन में यह सवाल ज़रूर उठता है—सारे जगत के पालनहार आखिर सदियों से एक ईंट पर क्यों खड़े हैं?
यह रहस्य केवल एक ईंट या एक मूर्ति का नहीं है। इसके पीछे द्वापर युग के काल यवन वध, त्रेता युग के राजा मुचुकुंद की मुक्ति और कलयुग के भक्त पुंडलिक की सच्ची सेवा का एक ऐसा दैवीय चक्रव्यूह जुड़ा है, जो अध्यात्म की सबसे बड़ी सीख देता है।
श्रीकृष्ण का रणछोड़ नाम: पलायन या एक सोची-समझी रणनीति?
द्वापर युग में जब जरासंध ने बार-बार मथुरा पर आक्रमण किया, तब उसके साथ एक ऐसा असुर भी आ जुड़ा जिसे हराना असंभव माना जा रहा था—काल यवन।
काल यवन को महादेव शिव का वरदान प्राप्त था कि कोई भी अस्त्र-शस्त्र, अग्नि, जल या देवता उसका वध नहीं कर सकते। उसके पास करोड़ों की अक्षौहिणी सेना थी और वह सीधे मथुरा की देहरी पर आकर यदुवंश को ललकार रहा था।
श्रीकृष्ण भली-भांति जानते थे कि अगर सीधे युद्ध हुआ, तो मथुरा की निर्दोष प्रजा का भारी संहार होगा। इसलिए उन्होंने एक ऐसी कूटनीतिक चाल चली जिसे दुनिया ने शुरू में कायरता समझा:
- द्वारका का निर्माण: सबसे पहले पूरी प्रजा और यदुवंशियों को रातों-रात समुद्र के बीच बसाई गई सुरक्षित नगरी द्वारका भेज दिया गया।
- निहत्थे मैदान छोड़ना: कान्हा बिना किसी अस्त्र के काल यवन के सामने आए और अचानक युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे।
- शत्रु को भटकाना: काल यवन अहंकार में भरकर श्रीकृष्ण को ‘कायर’ और ‘रणछोड़’ कहते हुए उनके पीछे दौड़ पड़ा।
श्रीकृष्ण भागे ज़रूर, लेकिन अपनी जान बचाने के लिए नहीं। वे काल यवन को उस नियति की ओर खींच रहे थे, जो हज़ारों वर्षों से एक अंधेरी गुफा में उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।
राजा मुचुकुंद और काल यवन का अंत
श्रीकृष्ण भागते-भागते एक गहरी पहाड़ी गुफा में प्रवेश कर गए। उस गुफा में इक्ष्वाकु वंश के महान महाराजा मुचुकुंद गहरी निद्रा में लीन थे।
राजा मुचुकुंद ने देवासुर संग्राम में देवताओं की रक्षा के लिए युगों तक युद्ध लड़ा था। जब युद्ध समाप्त हुआ, तो देवराज इंद्र ने उनसे वरदान मांगने को कहा। अत्यधिक थक चुके मुचुकुंद ने केवल एक वरदान मांगा—अखंड, शांत निद्रा।
इंद्र ने वरदान देते हुए कहा था कि जो कोई भी उन्हें नींद से जगाएगा, मुचुकुंद की पहली दृष्टि पड़ते ही वह भस्म होकर राख हो जाएगा।
| प्रमुख पात्र | भूमिका | वरदान / शक्ति |
| श्रीकृष्ण | लीलाधर, सूत्रधार | संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी, सुदर्शन चक्रधारी |
| काल यवन | म्लेच्छ असुर | किसी भी शस्त्र, अग्नि या जल से अवध्य |
| राजा मुचुकुंद | इक्ष्वाकु वंशी राजर्षि | दृष्टि पड़ते ही जगाने वाले को भस्म करने का वरदान |
| पुंडलिक | मुचुकुंद का अगला जन्म | माता-पिता की सच्ची सेवा से ईश्वर को बांधने वाला भक्त |
गुफा में पहुंचकर श्रीकृष्ण ने अपना पीतांबर सोए हुए मुचुकुंद के ऊपर डाल दिया और स्वयं एक कोने में छिप गए।
अंधकार में काल यवन ने समझा कि कान्हा चादर ओढ़कर छिप गए हैं। उसने अहंकार में आकर मुचुकुंद को लात मार दी। जैसे ही मुचुकुंद की आंखें खुलीं, उनके तपोबल की क्रोधाग्नि ने काल यवन को पलक झपके ही जलाकर राख का ढेर बना दिया।
मुचुकुंद को श्रीकृष्ण का अंतिम वचन
शत्रु का अंत होने के बाद जब मुचुकुंद ने सामने साक्षात नारायण के चतुर्भुज रूप के दर्शन किए, तो उनका सारा सांसारिक ताप मिट गया। उन्होंने प्रभु से हाथ जोड़कर केवल एक प्रार्थना की—मोक्ष।
भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा:
“हे राजर्षि! आपने धर्म की रक्षा के लिए अनेक युद्ध लड़े हैं। हिंसा का कुछ सूक्ष्म कर्म अभी शेष है। कर्मों का चक्र पूरा किए बिना मोक्ष संभव नहीं। आपको मृत्युलोक में एक अंतिम जन्म लेना होगा। दक्षिण के दिंडीर वन में आपका जन्म होगा, जहां संसार आपको ‘पुंडलिक’ के नाम से जानेगा। उस जन्म में आपका उद्धार करने मैं स्वयं आपके द्वार आऊंगा।”
मुचुकुंद बदरिकाश्रम जाकर तपस्या में लीन हो गए और इस तरह कलयुग की एक महान लीला की नींव पड़ी।
अज्ञानी पुंडलिक: पत्नी-मोह और माता-पिता का तिरस्कार
समय का चक्र घूमा और दक्षिण भारत के दिंडीर वन (वर्तमान पंढरपुर क्षेत्र) में मुचुकुंद की आत्मा ने पुंडलिक के रूप में जन्म लिया। लेकिन इस जन्म की शुरुआत बड़ी विचित्र थी।
युवावस्था में आते ही पुंडलिक अपनी पत्नी रूपा के सौंदर्य और मोह में पूरी तरह अंधा हो गया। पत्नी के कहने पर वह अपने वृद्ध माता-पिता के साथ नौकरों जैसा दुर्व्यवहार करने लगा:
- माता-पिता को घर के सबसे अंधेरे और ठंडे कोने में सोने के लिए विवश किया गया।
- उन्हें बासी और बचा-खुचा भोजन दिया जाता था।
- दिन-रात उनके खांसने या बोलने पर भी ताने मारे जाते थे।
हद तो तब हो गई जब पुंडलिक ने पत्नी के साथ काशी यात्रा पर जाने का निश्चय किया। समाज के डर से वह माता-पिता को पीछे तो नहीं छोड़ सका, लेकिन उन्हें तीर्थयात्री की तरह नहीं, बल्कि अपना भारी सामान ढोने वाले कुलियों की तरह पैदल साथ घसीट लाया। वह खुद पत्नी के साथ घोड़े पर चलता और बूढ़े माता-पिता पत्थरों पर नंगे पांव उसका बोझ ढोते थे।
आधी रात की वह अलौकिक घटना: गंगा का मैला रूप
यात्रा के दौरान एक रात वे घने जंगल में कुकुट स्वामी नामक एक शांत संत के आश्रम के बाहर ठहरे। पुंडलिक ने खुद तो कुटिया में विश्राम किया, लेकिन बूढ़े माता-पिता को कड़ाके की ठंड में खुले आंगन में छोड़ दिया।
आधी रात के सन्नाटे में जब पुंडलिक की आंख खुली, तो उसने आश्रम के आंगन में एक डरावना दृश्य देखा। कुछ अत्यंत कुरूप, काले वस्त्र पहने, मैले रूप वाली स्त्रियां आश्रम में झाड़ू लगा रही थीं और बर्तन साफ कर रही थीं।
पुंडलिक डर गया कि कहीं ये पिशाचियां तो नहीं। लेकिन कुछ ही देर में उसने देखा कि आश्रम की सेवा करते-करते वे सभी स्त्रियां दिव्य, चमकीले और स्वर्गीय रूप में बदल गईं। उनके शरीर से अलौकिक सुगंध आने लगी।
पुंडलिक ने घबराते हुए उनके चरण पकड़ लिए और पूछा, “आप देवियां कौन हैं? पहले आपका रूप इतना मलिन क्यों था और अब इतना प्रकाशवान कैसे हो गया?”
उनमें से मुख्य देवी ने उत्तर दिया:
“हम गंगा, यमुना और सरस्वती हैं। संसार भर के पापी हमारे जल में डुबकी लगाकर अपने पाप तो छोड़ जाते हैं, लेकिन जो लोग अपने घरों में साक्षात ईश्वर रूपी माता-पिता को रुलाते हैं, उनका पाप इतना भारी होता है कि हम स्वयं मैली हो जाती हैं। उसी मैल और पाप के बोझ को धोने के लिए हम हर रात कुकुट स्वामी के आंगन की धूल में लोटने आती हैं।”
पुंडलिक ने चौंककर पूछा कि इस साधारण आश्रम में ऐसा क्या पुण्य है?
गंगा माता ने कहा, “कुकुट स्वामी ने कोई वेद नहीं पढ़े, न ही कोई कठिन तप किया है। वे दिन-रात केवल अपने वृद्ध माता-पिता की सच्ची सेवा करते हैं। जहां माता-पिता का सम्मान होता है, वहां सारे तीर्थ स्वयं चलकर आते हैं। अरे अज्ञानी, तू जिन्हें पत्थरों पर घसीट रहा है, तेरा सबसे बड़ा तीर्थ तो तेरे ही घर में था!”
यह सुनते ही पुंडलिक की चेतना पर पड़ा अज्ञान का पर्दा हमेशा के लिए फट गया।
पश्चाताप का आंसू और सेवा का संकल्प
पुंडलिक दौड़ता हुआ बाहर आंगन में गया, जहां उसके माता-पिता ठंड से कांप रहे थे। उनके पैरों में पड़े छालों से खून बह रहा था।
पुंडलिक उनके चरणों में गिरकर बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगा:
- उसने अपने सारे पापों की क्षमा मांगी।
- काशी जाने का विचार तुरंत त्याग दिया।
- माता-पिता को पालकी में बिठाकर वापस घर लौटा।
उस दिन के बाद पुंडलिक का जीवन पूरी तरह बदल गया। उसके लिए अब न कोई दूसरा मंदिर था, न कोई तीर्थ। उसके माता-पिता ही उसके आराध्य बन चुके थे। वह दिन-रात उनकी सेवा में इतना लीन रहने लगा कि उसे अपनी सुध-बुध भी नहीं रहती थी।
रुक्मणी का मान और पंढरपुर का आगमन
उधर द्वारका में एक अलग ही लीला आकार ले रही थी। देवी रुक्मणी को जब यह भान हुआ कि प्रभु श्रीकृष्ण के हृदय के एक कोने में आज भी वृंदावन और राधा का प्रेम जीवित है, तो वे मान (रूठकर) करके दक्षिण के दिंडीर वन में आकर बैठ गईं।
भगवान श्रीकृष्ण रुक्मणी को मनाते हुए इस वन में पहुंचे। जब उन्होंने देवी को समझाया कि राधा उनका वैराग्य हैं लेकिन रुक्मणी उनका वर्तमान और आधार हैं, तब रुक्मणी शांत हुईं।
तभी श्रीकृष्ण के कदम सहसा रुक गए। उन्हें द्वापर युग में मुचुकुंद को दिया गया वह पुराना वचन याद आया:
“अब समय आ गया है कि मैं अपने उस भक्त के द्वार जाऊं, जो पुंडलिक के रूप में अपनी सेवा से पूरे ब्रह्मांड को आकर्षित कर रहा है।”
“प्रभु, ज़रा रुकिए!” — ईंट का वह ऐतिहासिक आसन
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं चलकर पुंडलिक की झोपड़ी के बाहर पहुंचे। प्रभु ने आवाज़ दी, “उठो पुंडलिक! तुम्हारी सेवा से प्रसन्न होकर वैकुंठ का स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वार पर खड़ा है। उठो और मुझे गले लगाओ।”
पुंडलिक उस समय अपने थके हुए माता-पिता के पैर दबा रहा था। उसने मुड़कर देखा—साक्षात परब्रह्म, सांवला सलोना रूप, सिर पर मोरमुकुट लिए द्वार पर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
किसी भी साधारण भक्त के लिए यह सुध-बुध खो देने वाला पल था। लेकिन पुंडलिक ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा:
“हे प्रभु! क्षमा करें। मैं अभी उठकर आपका स्वागत नहीं कर सकता। अगर मैं आपके दर्शन के लोभ में अपने माता-पिता की सेवा बीच में छोड़ दूंगा, तो मेरा कर्म खंडित हो जाएगा। बाहर ज़मीन पर कीचड़ है, आप कृपा करके इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए। जब तक मेरे माता-पिता की नींद पूरी नहीं होती, आपको यहीं रुकना होगा।”
पुंडलिक ने पास पड़ी एक ईंट (मराठी में ‘विट’) प्रभु की ओर सरका दी।
संसार जिसके एक इशारे पर चलता है, वह त्रिलोकीनाथ अपने भक्त के इस अगाध सेवा धर्म को देखकर भावविभोर हो गए। भगवान दोनों हाथ अपनी कमर पर रखकर चुपचाप उस ईंट पर खड़े हो गए।
भक्त की सच्ची सेवा ───> नारायण का आगमन ───> ईंट (विट) का आसन ───> 'विट्ठल' स्वरूप का प्राकट्य
28 युगों से निरंतर प्रतीक्षा
जब माता-पिता जागे और पुंडलिक ने अपनी सेवा पूरी की, तब वह बाहर आया और प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। उसने क्षमा मांगते हुए कहा, “हे नाथ, मैंने आपको इतनी देर प्रतीक्षा करवाई।”
भगवान ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया और कहा:
“पुंडलिक, तुमने सिद्ध कर दिया कि निस्वार्थ सेवा से बढ़कर संसार में कोई पूजा नहीं है। कलयुग में मनुष्य के पास कठिन तपस्या या बड़े-बड़े यज्ञ करने की शक्ति नहीं होगी। ऐसे में तुम्हारा यह सेवा मार्ग ही जीवों का उद्धार करेगा। मैं तुम्हारे इस भाव के वश में होकर यहीं इसी ईंट पर युगों-युगों तक खड़ा रहूंगा।”
मराठी में ईंट को ‘विट’ कहा जाता है, और जो ईंट पर खड़ा हुआ, वही भगवान ‘विट्ठल’ या ‘विठोबा’ कहलाए। संतों की गणना के अनुसार, भगवान विट्ठल पिछले 28 युगों से उसी ईंट पर कमर पर हाथ रखे अपने भक्तों की प्रतीक्षा में खड़े हैं।
जीवन की सबसे बड़ी सीख
पंढरपुर के विट्ठल मंदिर की यह पावन कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा दर्शन है:
- सच्चा तीर्थ घर के भीतर है: यदि आपके घर में आपके माता-पिता या वृद्धजन उपेक्षित और दुखी हैं, तो दुनिया के किसी भी तीर्थ में डुबकी लगाने से आपको पुण्य नहीं मिल सकता।
- कर्म ही सच्ची पूजा है: पुंडलिक ने साक्षात ईश्वर के सामने भी अपने सेवा-धर्म को पहले चुना। जब कर्म सच्चा होता है, तो ईश्वर स्वयं प्रतीक्षा करने को तैयार हो जाते हैं।
- ईश्वर भाव के भूखे हैं: भगवान को महंगे अनुष्ठान या सोने-चांदी के सिंहासन नहीं चाहिए; वे एक भक्त की श्रद्धा से दी गई टूटी ईंट पर भी युगों तक खड़े रह सकते हैं।
आज भी जब लाखों वारकरी आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर नंगे पांव ‘पुंडलिक वरदा हरि विट्ठल, श्री ज्ञानदेव तुकाराम’ का जयघोष करते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं, तो वे इसी निस्वार्थ प्रेम और सेवा भाव को नमन करते हैं।