13 साल की उम्र में संन्यास, दोनों किडनियां फेल और राधा रानी की कृपा: प्रेमानंद जी महाराज के जीवन का अद्भुत सच

जब शरीर की दोनों किडनियां काम करना बंद कर दें और सिर से छत तक छिन जाए, तब आम इंसान पूरी तरह टूट जाता है। लेकिन वृंदावन के पूज्य संत प्रेमानंद जी महाराज ने उसी असहनीय दर्द को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बना लिया और दुनिया को दिखाया कि अटूट विश्वास के आगे हर बीमारी घुटने टेक देती है।

आज सोशल मीडिया से लेकर वृंदावन की गलियों तक, हर जुबान पर प्रेमानंद जी महाराज का नाम है। आइए विस्तार से जानते हैं कि कानपुर के एक छोटे से गांव का 13 साल का बालक ‘अनिरुद्ध’ कैसे कठिन वैराग्य, काशी की तपोभूमि और वृंदावन की धूल से गुजरकर आज करोड़ों लोगों का आध्यात्मिक मार्गदर्शक बन गया।

कानपुर का अखरी गांव और बालक अनिरुद्ध का बचपन

साल 1969 में उत्तर प्रदेश के कानपुर के पास स्थित सरसौल ब्लॉक के अखरी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में बालक का जन्म हुआ। माता-पिता ने बड़े प्यार से उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे रखा। घर का माहौल पहले से ही धार्मिक था। दादाजी संन्यासी प्रवृत्ति के थे और पिता श्री शंभू पांडे (हरि नारायण जी) तथा माता श्रीमती रमा देवी भगवान के अनन्य भक्त थे।

घर में संतों का आना-जाना हमेशा लगा रहता था। बचपन में जब दूसरे बच्चे खेल-कूद और खिलौनों में व्यस्त रहते, तब बालक अनिरुद्ध मंदिर के चबूतरे पर बैठकर कीर्तन सुना करते थे। उन्हें सांसारिक खिलौनों से कभी लगाव नहीं रहा।

“बचपन से ही अनिरुद्ध के मन में एक ही विचार घूमता था—अगर यह शरीर एक दिन राख बन ही जाना है, तो क्यों न इसे उस ईश्वर की खोज में लगा दिया जाए जो अमर है?”

13 साल की उम्र में आधी रात को घर त्यागने का रहस्य

जैसे-जैसे अनिरुद्ध बड़े हो रहे थे, उनके भीतर वैराग्य की आग और तेज होती गई। जब वे कक्षा 5 या 6 में थे, तब उन्होंने गीता और संतों के प्रवचनों से यह गहराई से समझ लिया कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल और केवल भगवद-प्राप्ति है।

एक दिन जब गांव में भागवत कथा चल रही थी, तो उन्होंने संत के मुख से सुना कि मानव जीवन केवल रोटी कमाने और मरने के लिए नहीं मिला है। उसी रात अनिरुद्ध ने अपनी मां से सीधा सवाल किया:

“मां, जब सबको एक दिन यह संसार छोड़कर जाना ही है, तो क्यों न सीधे भगवान के पास जाने की तैयारी की जाए?”

मां ने इसे बच्चे का बचपना समझा और भोजन कराकर सोने के लिए कह दिया। लेकिन आधी रात को जब पूरा घर गहरी नींद में था, तब 13 वर्ष के अनिरुद्ध चुपचाप उठे। उन्होंने सो रहे माता-पिता के चरणों में दूर से ही सिर झुकाया, तुलसी के पौधे को प्रणाम किया और हमेशा के लिए घर की देहरी पार कर दी।

काशी की गलियां, गंगा तट और कठोर संन्यास मार्ग

घर से निकलने के बाद बालक अनिरुद्ध सीधे धर्मनगरी काशी (वाराणसी) पहुंचे। वहां का जीवन किसी भी आम इंसान के रोंगटे खड़े कर देने वाला था:

  • एकांत साधना और जप: दिन-रात गंगा किनारे बैठकर ‘ओम नमः शिवाय’ का अनवरत जप करना।
  • भिक्षा का कठोर नियम: दिन में केवल एक बार भिक्षुकों की कतार में बैठना। जो मिल गया, उसे प्रभु का भोग मानकर ग्रहण करना; न मिला तो केवल गंगाजल पीकर सो जाना।
  • अन्न का त्याग: कई बार ऐसा हुआ कि लगातार तीन-चार दिन तक कुछ खाने को नहीं मिला, लेकिन उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।

जब पिता को पता चला कि उनका 13 साल का बेटा काशी में भटक रहा है, तो वे तुरंत उसे लौटाने पहुंचे। पिता ने समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अनिरुद्ध का एक ही जवाब था—“पिताजी, मैं घर से भागा नहीं हूं, मैं तो अपने असली घर की ओर लौट रहा हूं।”

बेटे का अटल संकल्प देखकर पिता ने रोते हुए आशीर्वाद दिया और केवल एक ही सीख दी: “सत्य तेरी रोशनी बने, प्रेम तेरी राह बने और कभी किसी स्त्री पर गलत नजर मत डालना।” इसके बाद अनिरुद्ध ने संन्यास की दीक्षा ली और उनका नाम आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी हुआ।

वह एक घटना जिसने शिवभक्त को श्रीकृष्ण प्रेम में डुबो दिया

काशी में आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी जी पूरी तरह शंकर जी की आराधना में लीन थे। वे अद्वैत वेदांत और ज्ञान मार्ग के कठोर साधक बन चुके थे। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।

एक दिन एक साधु ने उनसे पास के विश्वविद्यालय में चल रही रासलीला देखने का बहुत आग्रह किया। पहले तो महाराज जी ने मना कर दिया क्योंकि ज्ञान मार्गी संन्यासी इन सब से दूर रहते हैं। लेकिन साधु के बार-बार कहने पर वे चले गए।

वहां मंच पर जैसे ही उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की लीला और श्रीकृष्ण की रासलीला देखी, उनका कठोर वैराग्य पिघलकर प्रेम के सागर में बदल गया। जिस मन में केवल निर्गुण ब्रह्म का ध्यान था, वहां अब साक्षात नटवर नागर श्रीकृष्ण बांसुरी बजाने लगे। रासलीला समाप्त होते-होते उनकी आंखों से प्रेमाश्रु बहने लगे।

उस रासलीला के व्यास जी ने उनकी तड़प देखकर कहा:

“महाराज, अब आपका काशी में काम पूरा हो गया। आपका असली ठिकाना तो वृंदावन है। एक बार बांके बिहारी के धाम चले जाइए, वे आपको कभी वापस नहीं आने देंगे।”

वृंदावन आगमन और रमणरेती में साधना

व्यास जी की बात सुनते ही आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी जी बिना कुछ सोचे चित्रकूट होते हुए सीधे मथुरा और वृंदावन पहुंचे। जब वे पहली बार रमणरेती की पवित्र धूल में पहुंचे, तो वहां लेटकर फूट-फूटकर रोने लगे। उन्हें लगा कि सदियों की भटकन के बाद आत्मा को अपना असली घर मिल गया है।

वृंदावन में उन्होंने बांके बिहारी और राधा रानी की भक्ति में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। वे पेड़ों के नीचे बैठकर 24 घंटे नाम जप में मग्न रहने लगे। संसार से पूरी तरह कटकर वे केवल ब्रजरज में लोटते और राधा नाम का कीर्तन करते।

दोनों किडनियां फेल: जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया

साधना का मार्ग जितना सुंदर था, शरीर की परीक्षा उतनी ही भयानक थी। साल बीतते गए और अचानक महाराज जी के शरीर में गंभीर समस्याएं शुरू हो गईं। जब असहनीय पेट दर्द और उल्टी के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, तो मेडिकल रिपोर्ट्स देखकर बड़े-बड़े डॉक्टर सन्न रह गए:

  1. दोनों किडनियां 100% खराब: डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि यह शरीर अब चिकित्सा विज्ञान के नियमों के अनुसार कुछ ही हफ्तों का मेहमान है।
  2. ऑटोइम्यून बीमारी: उनके शरीर में ऐसी स्थिति थी जहां शरीर की कोशिकाएं खुद अपने ही अंगों को नुकसान पहुंचा रही थीं।
  3. रोजाना डायलिसिस: डॉक्टरों ने तुरंत नियमित डायलिसिस शुरू करने को कहा।

जब डॉक्टरों ने मायूस होकर कहा कि “अब यह शरीर केवल भगवान के भरोसे है,” तो प्रेमानंद जी महाराज मुस्कुराए और बोले:

“डॉक्टर साहब, यह शरीर कभी डॉक्टरों के भरोसे था ही नहीं। यह तो जिस दिन से घर छोड़ा, उसी दिन से केवल और केवल भगवान के भरोसे है।”

आश्रम से निकाला जाना और टीले पर राधा रानी का भरोसा

बीमारी के दौर में ही एक दिन आश्रम के व्यवस्थापकों ने उनसे कह दिया कि वे आश्रम खाली कर दें। उन्होंने कहा कि आश्रम बीमार साधुओं की तीमारदारी का ठेका नहीं ले सकता।

महाराज जी ने बिना किसी नाराजगी या शिकायत के अपना झोला और कमंडल उठाया और 15 मिनट के भीतर आश्रम छोड़कर निकल पड़े। चलने की ताकत नहीं थी, शरीर में खून की कमी थी और भयंकर ठंड पड़ रही थी। वे वृंदावन के एक टीले पर सूखी झाड़ियों के बीच लेट गए।

उस रात शारीरिक पीड़ा अपने चरम पर थी, लेकिन महाराज जी के मन में केवल एक ही भाव था:

“हे श्यामा जू! अगर इस मिट्टी में मेरा शरीर छूटना लिखा है, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा। आपकी नगरी की यह धूल ही मेरा कफन बनेगी।”

भक्तों का मानना है कि उसी घोर परीक्षा की घड़ी में राधा रानी की विशेष कृपा का अनुभव उन्हें हुआ। अगली सुबह कुछ स्थानीय संतों की नजर उन पर पड़ी और वे उन्हें आदरपूर्वक अपने आश्रम ले गए।

राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षा और ‘प्रेमानंद’ नामकरण

वृंदावन की गलियों में घूमते हुए एक दिन महाराज जी के कानों में एक दिव्य पद की धुन सुनाई दी। जब उन्होंने पूछा कि यह अमृतवाणी किसकी है, तो पता चला कि यह श्री हरिवंश महाप्रभु द्वारा रचित राधावल्लभ संप्रदाय का वाणी-साहित्य है।

वे तुरंत श्री राधावल्लभ मंदिर पहुंचे। वहां श्री हित मोहित मराल गोस्वामी जी ने उनके भीतर की अलौकिक भक्ति को पहचाना और उन्हें शरण मंत्र दिया। इसके बाद उन्होंने पूज्य गौरांगी शरण जी महाराज से राधावल्लभीय संप्रदाय की पूर्ण दीक्षा ली।

दीक्षा के बाद उनका नाम पड़ा: पूज्य श्री प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज। अब ज्ञान का कठोर संन्यासी पूरी तरह से किशोरी जी (राधा रानी) के प्रेम रस में सराबोर हो चुका था।

आज की दिनचर्या: मेडिकल साइंस के लिए एक खुला चमत्कार

पिछले 15 से 20 वर्षों से प्रेमानंद जी महाराज बिना काम करने वाली किडनियों के जी रहे हैं। चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ आज भी हैरान हैं कि कोई व्यक्ति इतने कम हीमोग्लोबिन और दोनों किडनियां फेल होने के बावजूद इतना सक्रिय कैसे रह सकता है।

समयदिनचर्या
रात 2:00 बजेजागना और श्रीजी की नित्य सेवा व ध्यान
रात 3:30 बजेवृंदावन की पवित्र परिक्रमा (पैदल भ्रमण)
सुबह 5:30 बजेसाधकों और भक्तों के साथ एकांतिक वार्तालाप
दोपहरनियमित मेडिकल जांच, डायलिसिस और नाम जप
शामवाणी पाठ, सत्संग और संतों का दर्शन

वे आज भी प्रतिदिन घंटों बैठकर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं, युवाओं और मशहूर हस्तियों की शंकाओं का समाधान करते हैं।

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज की 5 प्रमुख शिक्षाएं

महाराज जी का दर्शन बहुत व्यावहारिक है। वे अंधविश्वास या आडंबर को बढ़ावा नहीं देते, बल्कि शुद्ध आचरण की बात करते हैं:

  1. नाम जप की शक्ति: वे हर व्यक्ति को कहते हैं कि दिनभर जो भी काम करो, जीभ पर ‘राधा-राधा’ या अपने इष्ट का नाम निरंतर चलते रहना चाहिए।
  2. माता-पिता की सेवा: उनका स्पष्ट कहना है कि यदि आपने अपने जीवित माता-पिता का दिल दुखाया है, तो किसी भी मंदिर में माथा टेकने से भगवान नहीं मिलेंगे।
  3. पवित्र दृष्टि और ब्रह्मचर्य: पराई स्त्री को माता या बहन की दृष्टि से देखना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। वासना इंसान की आध्यात्मिक ऊर्जा को नष्ट कर देती है।
  4. अन्न और आचरण की शुद्धि: जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। मांसाहार, नशा और चोरी की कमाई से कभी मन शांत नहीं रह सकता।
  5. दुख को प्रभु का वरदान समझो: जब जीवन में कष्ट आए, तो समझो कि भगवान आपके पिछले पापों को धोकर आपको अपने करीब बुला रहे हैं।

निष्कर्ष

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि इंसान केवल चमड़े और हड्डियों का पुतला नहीं है। यदि संकल्प में सच्चाई हो और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण हो, तो शरीर की बड़ी से बड़ी लाचारी भी आपके कदमों को रोक नहीं सकती।

आज जब पूरी दुनिया मानसिक तनाव, अवसाद और भटकाव से जूझ रही है, तब वृंदावन के इस फकीर की एक मुस्कान और मीठी वाणी लाखों टूटे हुए दिलों को जीने की नई राह दिखा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. प्रेमानंद जी महाराज का बचपन का नाम क्या था?

उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था और वे उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के अखरी गांव के रहने वाले हैं।

2. प्रेमानंद जी महाराज की दोनों किडनियां कब खराब हुईं?

युवावस्था में जब वे वृंदावन में कठोर तपस्या कर रहे थे, तभी ऑटोइम्यून बीमारी के कारण उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। वे पिछले कई वर्षों से नियमित डायलिसिस पर हैं।

3. प्रेमानंद जी महाराज किस संप्रदाय से जुड़े हैं?

वे श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित राधावल्लभ संप्रदाय से जुड़े हुए हैं और राधा केली कुंज, परिक्रमा मार्ग, वृंदावन में निवास करते हैं।

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