दुनिया भर में इस समय एक ऐसा साइलेंट युद्ध चल रहा है जिसमें तोप और गोलों की नहीं, बल्कि रेत के एक छोटे से दाने से बनी सिलिकॉन चिप की लड़ाई लड़ी जा रही है। आज हमारी मिसाइलें, फाइटर जेट्स, सैटेलाइट्स, रडार, मोबाइल, बैंकिंग और मेडिकल सिस्टम पूरी तरह से विदेशी चिप्स पर निर्भर हैं। अगर बाहर से यह सप्लाई चेन एक हफ्ते के लिए भी रुक जाए, तो हमारे आसपास मौजूद हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ठप पड़ जाएगा।
यह तकनीक रातों-रात पैदा नहीं हुई। इसे आज के आधुनिक रूप तक पहुंचने में 200 से अधिक वर्षों का सफर तय करना पड़ा है।
1800 का दौर: स्थिर चार्ज से बैटरी और मोर्स कोड की शुरुआत
1800 के दशक की शुरुआत में बिजली का मतलब केवल स्टैटिक इलेक्ट्रिसिटी यानी घर्षण से पैदा होने वाला एक झटका हुआ करता था। वैज्ञानिक एलेक्जेंडर वोल्टा ने इस समस्या को सुलझाने के लिए दुनिया की पहली बैटरी बनाई, जिसे ‘वोल्टिक पाइल’ कहा गया। इस आविष्कार से पहली बार इंसानों के हाथ में लगातार बहने वाला करंट आया।
उस समय बिजली से चलने वाले उपकरण मौजूद नहीं थे। तभी एक अमेरिकी चित्रकार सैमुअल मोर्स के निजी जीवन की एक दुखद घटना ने संचार की दुनिया बदल दी। जब मोर्स दूर थे, तब उनकी पत्नी की बीमारी की खबर खत के जरिए हफ्तों बाद पहुंची और जब तक वे घर लौटे, तब तक उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था।
इस धीमे कम्युनिकेशन को खत्म करने की ठानकर मोर्स ने वोल्टा की बैटरी और जोसेफ हेनरी के इलेक्ट्रोमैग्नेट को जोड़कर एक टेलीग्राफ सिस्टम बनाया। उन्होंने डॉट (.) और डैश (-) पर आधारित एक भाषा तैयार की, जिसे आज मोर्स कोड कहा जाता है। 24 मई 1844 को यूएस कैपिटल से 71 किलोमीटर दूर पहला संदेश भेजा गया: “What hath God wrought”. जिस दूरी को तय करने में पूरा दिन लगता था, वह संदेश महज एक मिनट में पहुंच गया।
टेलीफोन का आविष्कार और मैक्सवेल की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स
मोर्स कोड तार के जरिए सिग्नल भेज रहा था, लेकिन तार का इलेक्ट्रिकल रेजिस्टेंस लंबी दूरी पर सिग्नल को कमजोर कर देता था। इसके लिए जगह-जगह बैटरी रिले स्टेशन लगाने पड़ते थे।
अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने सोचा कि अगर तार से करंट के जरिए कोड भेजा जा सकता है, तो इंसानी आवाज क्यों नहीं? आवाज असल में हवा का कंपन (वाइब्रेशन) है। बेल ने एक एसिड से भरा कप, मेटल फिल्म (डायफ्राम) और सुई का इस्तेमाल करके पहला टेलीफोन तैयार किया।
- जब कोई डायफ्राम के सामने बोलता था, तो सुई एसिड में ऊपर-नीचे होती थी।
- इससे सर्किट का कांटेक्ट रेजिस्टेंस बदलता था और तार में बहने वाला करंट आवाज के कंपन के हिसाब से कम-ज्यादा होता था।
- दूसरे छोर पर मौजूद इलेक्ट्रोमैग्नेट इस बदलते करंट से दूसरे डायफ्राम को हिलाती थी, जिससे फिर से वही आवाज पैदा होती थी।
इसके बाद सवाल उठा कि क्या बिना तार के हवा में सिग्नल भेजा जा सकता है? 1879 में जर्मनी के हेनरिक हर्ट्ज़ ने मैक्सवेल की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव थ्योरी को प्रैक्टिकली साबित किया। उन्होंने स्पार्क गैप के जरिए दिखाया कि बिजली बिना तार के भी हवा में तरंगों के रूप में ट्रैवल कर सकती है। इन्हीं के सम्मान में आज फ्रीक्वेंसी की यूनिट को हर्ट्ज़ (Hz) कहा जाता है।
मार्कोनी और वायरलेस का विस्तार: आयनोस्फीयर का चमत्कार
इटली के गुग्लिएल्मो मार्कोनी ने हर्ट्ज़ की खोज को लंबी दूरी के संचार में बदलने का काम किया। उन्होंने पाया कि एंटीना जितना ऊंचा होगा, सिग्नल उतनी दूर तक जाएगा। इटली की सरकार द्वारा प्रोजेक्ट रिजेक्ट किए जाने के बाद मार्कोनी इंग्लैंड गए, जहां ब्रिटिश नेवी ने उनके प्रोजेक्ट को फंड किया।
12 दिसंबर 1901 को मार्कोनी ने इंग्लैंड से 3,500 किलोमीटर दूर कनाडा में अटलांटिक महासागर के पार रेडियो संदेश भेजकर सबको चौंका दिया। उस समय वैज्ञानिकों का मानना था कि पृथ्वी गोल है और तरंगे सीधी चलती हैं, तो सिग्नल स्पेस में चला जाएगा।
बाद में पता चला कि वायुमंडल की ऊपरी परत आयनोस्फीयर (Ionosphere) और नीचे समुद्र का पानी इन रेडियो तरंगों के लिए शीशे (मिरर) की तरह काम करते हैं, जिससे टकराकर सिग्नल हजारों किलोमीटर दूर पहुंच गया। 1909 में मार्कोनी को इसके लिए नोबेल प्राइज मिला।
वैक्यूम ट्यूब और ट्रायोड: सिग्नल एम्प्लीफिकेशन का जन्म
दूरी बढ़ने के साथ वायरलेस सिग्नल बेहद कमजोर हो जाते थे। इन्हें दोबारा शक्तिशाली बनाने के लिए एम्प्लीफिकेशन (Amplification) की जरूरत थी। इसका समाधान थॉमस एडिसन के एक पुराने प्रयोग में छिपा था जिसे ‘एडिसन इफेक्ट’ कहा जाता है। एडिसन के बल्ब में गर्म फिलामेंट से इलेक्ट्रॉन निकलकर पास रखी मेटल प्लेट पर टकराते थे, जिससे बिना तार जुड़े करंट बहता था।
1906 में ली डी फॉरेस्ट ने इस वैक्यूम ट्यूब में फिलामेंट और प्लेट के बीच एक पतली तार की जाली (कंट्रोल ग्रिड) लगा दी। इसे ट्रायोड (Triode) नाम दिया गया:
- एंटीना से आने वाले कमजोर सिग्नल को इस जाली से जोड़ा गया।
- जाली पर आने वाला हल्का सा वोल्टेज बदलाव फिलामेंट से प्लेट की तरफ जाने वाले लाखों इलेक्ट्रॉनों के फ्लो को पूरी तरह कंट्रोल करने लगा।
- इससे छोटे इनपुट सिग्नल से एक बहुत बड़ा आउटपुट करंट मिला, जिसने एम्प्लीफिकेशन की समस्या खत्म कर दी।
यह ट्रायोड एक ऑन/ऑफ स्विच की तरह भी काम कर सकता था। यही ऑन (1) और ऑफ (0) आगे चलकर बाइनरी कंप्यूटर की भाषा बना। 1945 में बना दुनिया का पहला बड़ा कंप्यूटर ENIAC, 18,000 वैक्यूम ट्यूब्स पर ही चलता था। यह एक पूरी इमारत जितना बड़ा था, भारी बिजली खाता था और इसकी ट्यूब्स लगातार खराब होती रहती थीं।
बेल लैब्स, सॉलिड स्टेट फिजिक्स और सेमीकंडक्टर क्रांति
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रडार और कोड-ब्रेकिंग सिस्टम्स के लिए ऐसे उपकरणों की जरूरत पड़ी जो जंगलों, रेगिस्तानों और युद्धपोतों में बिना टूटे काम कर सकें। वैक्यूम ट्यूब्स बहुत नाजुक थीं।
अमेरिकी टेलीकॉम कंपनी की रिसर्च विंग बेल लैब्स (Bell Labs) ने इस दिशा में काम शुरू किया। उन्होंने सिलिकॉन और जर्मेनियम जैसे सॉलिड क्रिस्टल्स पर रिसर्च की और सेमीकंडक्टर तकनीक को जन्म दिया:
| मटेरियल टाइप | विशेषता | इलेक्ट्रॉनिक व्यवहार |
| कंडक्टर | पूरी तरह खुला रास्ता | बिना रुकावट करंट बहता है |
| इंसुलेटर | पूरी तरह ब्लॉक रास्ता | करंट बिल्कुल नहीं बहता |
| सेमीकंडक्टर | नियंत्रित रास्ता | अपनी जरूरत के अनुसार करंट के फ्लो को स्विच और कंट्रोल किया जा सकता है |
सेमीकंडक्टर बिना किसी वैक्यूम या नाजुक ग्लास ट्यूब के ठोस अवस्था (Solid State) में करंट को कंट्रोल करते हैं। इसके बाद जैक किल्बी और रॉबर्ट नॉयस ने सिलिकॉन की एक ही चिप पर कई ट्रांजिस्टर जोड़कर इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) बनाई।
2 नैनोमीटर की सीमा और क्वांटम टनलिंग
कंप्यूटर की ताकत बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों ने सिलिकॉन ट्रांजिस्टर का साइज छोटा करना शुरू किया। आज चिप्स 2 नैनोमीटर (nm) के स्केल तक पहुंच चुकी हैं (तुलना के लिए, इंसानी बाल लगभग 80,000 से 1,00,000 नैनोमीटर मोटा होता है)।
हालांकि, 2 नैनोमीटर के बाद क्लासिकल फिजिक्स के नियम काम करना बंद कर देते हैं और क्वांटम टनलिंग (Quantum Tunneling) की समस्या शुरू हो जाती है:
- जब ट्रांजिस्टर का गेट (दीवार) परमाणु जितना पतला हो जाता है, तो इलेक्ट्रॉन उस बैरियर को पार करके लीक होने लगते हैं।
- इससे ट्रांजिस्टर को ‘ऑफ’ करने पर भी करंट रुकता नहीं है, जिससे स्विचिंग फेल हो जाती है।
- इस फिजिकल लिमिट से निपटने के लिए इंडस्ट्री अब फ्लैट चिप्स की जगह 3D ट्रांजिस्टर (GAAFET / FinFET) और नई पैकेजिंग तकनीकों का सहारा ले रही है।
ताइवान की ‘सिलिकॉन शील्ड’ और TSMC का दबदबा
1980 के दशक में अमेरिका चिप डिजाइन में आगे था, लेकिन चिप बनाने की फैब्रिकेशन यूनिट (Fab) लगाने में अरबों डॉलर का खर्च आता था। उसी समय ताइवान के मॉरिस चांग ने एक नया बिजनेस मॉडल पेश किया जिसे प्योर-प्ले फाउंड्री कहा जाता है।
उन्होंने 1987 में TSMC (Taiwan Semiconductor Manufacturing Company) बनाई और दुनिया भर की कंपनियों से कहा: “आप सिर्फ डिजाइन और रिसर्च पर ध्यान दें, मैन्युफैक्चरिंग हम करेंगे।”
आज दुनिया की 70% से अधिक और सबसे एडवांस (sub-5nm) चिप्स की 90% मैन्युफैक्चरिंग अकेले ताइवान में होती है। एप्पल, एनवीडिया, एएमडी और क्वालकॉम जैसी दिग्गज कंपनियां TSMC पर निर्भर हैं। इस रणनीतिक बढ़त को ‘सिलिकॉन शील्ड’ कहा जाता है। अमेरिका और पश्चिमी देश ताइवान की सुरक्षा के लिए इसलिए खड़े हैं क्योंकि अगर ताइवान की चिप सप्लाई रुकती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान होगा।
1983 की वो भूल: भारत कैसे पिछड़ा?
भारत सेमीकंडक्टर की दौड़ में कभी पीछे नहीं था। 1976 में भारत सरकार ने मोहाली (चंडीगढ़ के पास) में SCL (Semiconductor Complex Limited) की स्थापना की।
- 1983 में जब SCL चालू हुई, तब भारत 4-माइक्रोन चिप्स का निर्माण कर रहा था।
- उस समय ताइवान की TSMC कंपनी अस्तित्व में भी नहीं आई थी।
- 13 फरवरी 1989 को एक संदिग्ध आग में SCL का पूरा फैब्रिकेशन प्लांट, रिसर्च डेटा और महंगे उपकरण जलकर खाक हो गए।
इस दुर्घटना के बाद भारत ने चिप प्लांट को तुरंत दोबारा खड़ा करने के बजाय बाहर से चिप्स इम्पोर्ट करने का रास्ता चुना। इस एक रणनीतिक चूक ने भारत को सेमीकंडक्टर क्रांति में दशकों पीछे धकेल दिया।
भारत के लिए आगे की राह और चुनौतियां
आज चिप्स केवल गैजेट्स के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता और नेशनल सिक्योरिटी के लिए अनिवार्य हैं। भारत में सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने के लिए तीन बुनियादी जरूरतें हैं:
- अल्ट्रा-प्योर पानी (Ultra-Pure Water): चिप निर्माण के लिए आरओ से भी लाखों गुना शुद्ध पानी की लगातार सप्लाई चाहिए होती है।
- निर्बाध बिजली (Uninterrupted Power): चिप वेफर पर काम के दौरान एक मिलीसेकंड का पावर कट भी हजारों चिप्स और करोड़ों का माल बर्बाद कर सकता है।
- एडवांस्ड टैलेंट और इकोसिस्टम: केवल थ्योरी पढ़ने वाले इंजीनियर्स नहीं, बल्कि मटीरियल साइंस, प्रिसिजन इंजीनियरिंग और नैनोटेक्नोलॉजी पर काम करने वाले प्रैक्टिकल वर्कफोर्स की जरूरत है।
भारत के पास सेमीकंडक्टर मिशन के तहत अपना घरेलू इकोसिस्टम खड़ा करने का एक अहम मौका है। आत्मनिर्भर बनने के लिए मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग (ATMP/OSAT) और डिजाइन तीनों स्तरों पर तेजी से काम करना होगा ताकि देश का डिजिटल और डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर किसी विदेशी सप्लाई चेन का मोहताज न रहे।